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जब होता हैं दर्द...

एक गरीब के दिल की दास्तां

इंसान हूँ मैं भी, सपने सजाए हैं मैंने भी,
मैं भी इंसानों की भीड़ में हूँ शामिल,
फिर ये दुनिया क्यों मुझे महसूस करवाती हैं कि
मैं सबसे अलग हूँ.....
क्या हुआ अगर मैं गरीब हूँ और तुम अमीर हो,
हूँ तो मैं उसी भगवान की बनाई हुई दुनिया का हिस्सा,
जिसमें तुम और मैं दोनों शामिल हैं,
होता हैं दर्द....
ये सोचकर कि इंसान ही इंसान का दुश्मन हैं,
क्यों हैं इतना भेदभाव मुझसे एक इंसान होने पर भी,
अमीरों की इस दुनिया में नहीं हैं कोई पहचान इस गरीब की,
किसने किया....
मुझे अलग इस मातृभूमि से,
क्या हक हैं तुम्हारा मुझे ठुकराने का,
क्या हमारी कोई भावनाऐं नही हैं,
क्यों नहीं समझता कोई....
मुझ गरीब की इच्छाओं को, आकांक्षाओं को,
हैं मुझे विश्वास कि कोई तो समझेगा,
मेरे दर्द को, मेरे एहसास को,
होगी मेरी भी....
एक पहचान इस दुनिया की भीड़ में,
मत समझो अमीर और गरीब में फर्क,
तुम्हारी ही तरह एक इंसान हूँ मैं भी,
नहीं हूँ मैं सबसे अलग।

प्रतिक्रियाएँ

Re: जब होता हैं दर्द...
आपने बिलकुल सही कहां है | हम सब भगवान के बनाये हुए ईंसान है | मगर हम अपने अभियानी मन को समजा नहीं पाते और लोगो को धर्म, जाति, अमिर तथा गरीब कें विभागो में बांट रहे है |
Re: जब होता हैं दर्द...
पहली बार पढा है आपका ब्लोग अच्छा लिखती है आप|
Re: जब होता हैं दर्द...
प्रियंका, आपकी अभिव्यक्ति खूबसूरत है। भावों पर नियंत्रण है बस अपना शब्द-संसार और समृद्ध कर लों तो स्थापित लेखिका बन सकती हो ये मेरा दावा है। - स्मृति
Re: जब होता हैं दर्द...
mera imail webdunia me nhi he mera id ashok.raj31@yahoo.in me he apka sujhao mujhe bhut acha laga /galti ko maf kijiyga.sahi ko syekar kijiyga/ mujhe English nhi ati
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